महाभारत 5.94.38काकुदीकं शुकं नाकमक्षिसंतर्जनं तथासंतानं नर्तनं घोरमास्यमोदकमष्टमम्kākudīkaṃ śukaṃ nākamakṣisaṃtarjanaṃ tathāsaṃtānaṃ nartanaṃ ghoramāsyamodakamaṣṭamamइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें