महाभारत 5.95.4
निमित्तमरणास्त्वन्ये चन्द्रसूर्यौ मही जलम्वायुरग्निस्तथाकाशं ग्रहास्तारागणास्तथा
nimittamaraṇāstvanye candrasūryau mahī jalamvāyuragnistathākāśaṃ grahāstārāgaṇāstathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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