महाभारत 5.96.21
अशास्यानपि शास्त्येष रक्षोबन्धुषु राजसुसृष्टः प्रथमजो दण्डो ब्रह्मणा ब्रह्मवादिना
aśāsyānapi śāstyeṣa rakṣobandhuṣu rājasusṛṣṭaḥ prathamajo daṇḍo brahmaṇā brahmavādinā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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