महाभारत 5.97.5
अत्र दिव्यं हयशिरः काले पर्वणि पर्वणिउत्तिष्ठति सुवर्णाभं वार्भिरापूरयञ्जगत्
atra divyaṃ hayaśiraḥ kāle parvaṇi parvaṇiuttiṣṭhati suvarṇābhaṃ vārbhirāpūrayañjagat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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