महाभारत 6.103.10
तस्मिन्रात्रिमुखे घोरे पाण्डवा वृष्णिभिः सहसृञ्जयाश्च दुराधर्षा मन्त्राय समुपाविशन्
tasminrātrimukhe ghore pāṇḍavā vṛṣṇibhiḥ sahasṛñjayāśca durādharṣā mantrāya samupāviśan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें