महाभारत 6.103.72
निक्षिप्तशस्त्रे पतिते विमुक्तकवचध्वजेद्रवमाणे च भीते च तवास्मीति च वादिनि
nikṣiptaśastre patite vimuktakavacadhvajedravamāṇe ca bhīte ca tavāsmīti ca vādini
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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