महाभारत 6.103.85
गुरुणा कुलवृद्धेन कृतप्रज्ञेन धीमतापितामहेन संग्रामे कथं योत्स्यामि माधव
guruṇā kulavṛddhena kṛtaprajñena dhīmatāpitāmahena saṃgrāme kathaṃ yotsyāmi mādhava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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