महाभारत 6.104.9
केकया भ्रातरः पञ्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान्जघनं पालयामास पाण्डुसैन्यस्य भारत
kekayā bhrātaraḥ pañca dhṛṣṭaketuśca vīryavānjaghanaṃ pālayāmāsa pāṇḍusainyasya bhārata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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