महाभारत 6.105.32
हत्वा दश सहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम्सारोहाणां महाराज हयानां चायुतं पुनः
hatvā daśa sahasrāṇi kuñjarāṇāṃ tarasvināmsārohāṇāṃ mahārāja hayānāṃ cāyutaṃ punaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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