महाभारत 6.111.5
यथाप्रतिज्ञं कौरव्यः स चापि समितिंजयःपार्थानामकरोद्भीष्मः सततं समितिक्षयम्
yathāpratijñaṃ kauravyaḥ sa cāpi samitiṃjayaḥpārthānāmakarodbhīṣmaḥ satataṃ samitikṣayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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