महाभारत 6.112.25ततः स्वरथमारोप्य पौरवं तनयस्तवजयत्सेनो रथे राजन्नपोवाह रणाजिरात्tataḥ svarathamāropya pauravaṃ tanayastavajayatseno rathe rājannapovāha raṇājirātइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें