महाभारत 6.112.32
कौसल्यस्य पुनश्चापि धनुश्चिच्छेद फाल्गुणिःआजघान शरैश्चैव त्रिंशता कङ्कपत्रिभिः
kausalyasya punaścāpi dhanuściccheda phālguṇiḥājaghāna śaraiścaiva triṃśatā kaṅkapatribhiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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