महाभारत 6.112.41
विराटश्च महाराज सैन्धवं वाहिनीमुखेत्रिंशता निशितैर्बाणैराजघान स्तनान्तरे
virāṭaśca mahārāja saindhavaṃ vāhinīmukhetriṃśatā niśitairbāṇairājaghāna stanāntare
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें