महाभारत 6.112.75
न तत्रासीन्महाराज सोमकानां महारथःयः संप्राप्य रणे भीष्मं जीविते स्म मनो दधे
na tatrāsīnmahārāja somakānāṃ mahārathaḥyaḥ saṃprāpya raṇe bhīṣmaṃ jīvite sma mano dadhe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें