महाभारत 6.112.94
यथाग्निरिन्धनं प्राप्य ज्वलेद्दीप्तार्चिरुल्बणःतथा जज्वाल पुत्रस्ते पाण्डवान्वै विनिर्दहन्
yathāgnirindhanaṃ prāpya jvaleddīptārcirulbaṇaḥtathā jajvāla putraste pāṇḍavānvai vinirdahan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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