महाभारत 6.116.32
मनुष्या जगति श्रेष्ठाः पक्षिणां गरुडो वरःसरसां सागरः श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम्
manuṣyā jagati śreṣṭhāḥ pakṣiṇāṃ garuḍo varaḥsarasāṃ sāgaraḥ śreṣṭho gaurvariṣṭhā catuṣpadām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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