महाभारत 6.15.35
सर्वलोकेश्वरस्येव परमेष्ठिप्रजापतेःकथं प्रहर्तुमपि ते शेकुः संजय पाण्डवाः
sarvalokeśvarasyeva parameṣṭhiprajāpateḥkathaṃ prahartumapi te śekuḥ saṃjaya pāṇḍavāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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