महाभारत 6.15.40
प्रज्ञा परायणं तज्ज्ञं सद्धर्मनिरतं शुचिम्वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं कथं शंससि मे हतम्
prajñā parāyaṇaṃ tajjñaṃ saddharmanirataṃ śucimvedavedāṅgatattvajñaṃ kathaṃ śaṃsasi me hatam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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