महाभारत 6.15.55
न चास्त्रेण न शौर्येण तपसा मेधया न चन धृत्या न पुनस्त्यागान्मृत्योः कश्चिद्विमुच्यते
na cāstreṇa na śauryeṇa tapasā medhayā na cana dhṛtyā na punastyāgānmṛtyoḥ kaścidvimucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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