महाभारत 6.19.31
क्षरन्त इव जीमूता मदार्द्राः पद्मगन्धिनःराजानमन्वयुः पश्चाच्चलन्त इव पर्वताः
kṣaranta iva jīmūtā madārdrāḥ padmagandhinaḥrājānamanvayuḥ paścāccalanta iva parvatāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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