महाभारत 6.19.38
पपात महती चोल्का प्राङ्मुखी भरतर्षभउद्यन्तं सूर्यमाहत्य व्यशीर्यत महास्वना
papāta mahatī colkā prāṅmukhī bharatarṣabhaudyantaṃ sūryamāhatya vyaśīryata mahāsvanā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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