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महाभारत 6.22.13
समीक्ष्य सेनाग्रगतं दुरासदं; प्रविव्यथुः पङ्कगता इवोष्ट्राःवृकोदरं वारणराजदर्पं; योधास्त्वदीया भयविग्नसत्त्वाः
samīkṣya senāgragataṃ durāsadaṃ; pravivyathuḥ paṅkagatā ivoṣṭrāḥvṛkodaraṃ vāraṇarājadarpaṃ; yodhāstvadīyā bhayavignasattvāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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