महाभारत 6.24.60
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितःइन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः
yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥindriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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