महाभारत 6.25.10
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिःअनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्
sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā purovāca prajāpatiḥanena prasaviṣyadhvameṣa vo'stviṣṭakāmadhuk
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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