महाभारत 6.25.20
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयःलोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि
karmaṇaiva hi saṃsiddhimāsthitā janakādayaḥlokasaṃgrahamevāpi saṃpaśyankartumarhasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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