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महाभारत 6.26.16
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताःतत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्
kiṃ karma kimakarmeti kavayo'pyatra mohitāḥtatte karma pravakṣyāmi yajjñātvā mokṣyase'śubhāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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