महाभारत 6.26.32
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखेकर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे
evaṃ bahuvidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhekarmajānviddhi tānsarvānevaṃ jñātvā vimokṣyase
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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