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महाभारत 6.28.35
श्रीभगवानुवाचअसंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते
śrībhagavānuvācaasaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calamabhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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