महाभारत 6.3.24
ग्रहौ ताम्रारुणशिखौ प्रज्वलन्ताविव स्थितौसप्तर्षीणामुदाराणां समवच्छाद्य वै प्रभाम्
grahau tāmrāruṇaśikhau prajvalantāviva sthitausaptarṣīṇāmudārāṇāṃ samavacchādya vai prabhām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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