महाभारत 6.3.41
पक्वापक्वेति सुभृशं वावाश्यन्ते वयांसि चनिलीयन्ते ध्वजाग्रेषु क्षयाय पृथिवीक्षिताम्
pakvāpakveti subhṛśaṃ vāvāśyante vayāṃsi canilīyante dhvajāgreṣu kṣayāya pṛthivīkṣitām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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