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महाभारत 6.30.25
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते
dhūmo rātristathā kṛṣṇaḥ ṣaṇmāsā dakṣiṇāyanamtatra cāndramasaṃ jyotiryogī prāpya nivartate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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