महाभारत 6.30.5
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः
antakāle ca māmeva smaranmuktvā kalevaramyaḥ prayāti sa madbhāvaṃ yāti nāstyatra saṃśayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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