महाभारत 6.36.2
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताःसर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥsarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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