महाभारत 6.4.10
एवं ब्रुवति विप्रेन्द्रे धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतःआक्षिप्य वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्पथेनाप्ययात्पुनः
evaṃ bruvati viprendre dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥākṣipya vākyaṃ vākyajño vākpathenāpyayātpunaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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