महाभारत 6.40.4
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तमत्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः
niścayaṃ śṛṇu me tatra tyāge bharatasattamatyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ saṃprakīrtitaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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