महाभारत 6.44.27
साश्वारोहान्विषाणाग्रैरुत्क्षिप्य तुरगान्द्विपाःरथौघानवमृद्नन्तः सध्वजान्परिचक्रमुः
sāśvārohānviṣāṇāgrairutkṣipya turagāndvipāḥrathaughānavamṛdnantaḥ sadhvajānparicakramuḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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