महाभारत 6.44.30
आशुगा विमलास्तीक्ष्णाः संपेतुर्भुजगोपमाःनराश्वकायान्निर्भिद्य लौहानि कवचानि च
āśugā vimalāstīkṣṇāḥ saṃpeturbhujagopamāḥnarāśvakāyānnirbhidya lauhāni kavacāni ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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