महाभारत 6.45.3एतैरतिरथैर्गुप्तः पञ्चभिर्भरतर्षभपाण्डवानामनीकानि विजगाहे महारथःetairatirathairguptaḥ pañcabhirbharatarṣabhapāṇḍavānāmanīkāni vijagāhe mahārathaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें