महाभारत 6.46.14
जीवितस्य हि शेषेण तपस्तप्स्यामि दुश्चरम्न घातयिष्यामि रणे मित्राणीमानि केशव
jīvitasya hi śeṣeṇa tapastapsyāmi duścaramna ghātayiṣyāmi raṇe mitrāṇīmāni keśava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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