महाभारत 6.46.26
शोकार्तं पाण्डवं ज्ञात्वा दुःखेन हतचेतसम्अब्रवीत्तत्र गोविन्दो हर्षयन्सर्वपाण्डवान्
śokārtaṃ pāṇḍavaṃ jñātvā duḥkhena hatacetasamabravīttatra govindo harṣayansarvapāṇḍavān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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