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महाभारत 6.46.37
रणे भीष्मं तथा द्रोणं कृपं शल्यं जयद्रथम्सर्वानद्य रणे दृप्तान्प्रतियोत्स्यामि पार्थिव
raṇe bhīṣmaṃ tathā droṇaṃ kṛpaṃ śalyaṃ jayadrathamsarvānadya raṇe dṛptānpratiyotsyāmi pārthiva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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