महाभारत 6.46.41
तथोक्तः स नृदेवेन विष्णुर्वज्रभृता इवप्रभाते सर्वसैन्यानामग्रे चक्रे धनंजयम्
tathoktaḥ sa nṛdevena viṣṇurvajrabhṛtā ivaprabhāte sarvasainyānāmagre cakre dhanaṃjayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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