महाभारत 6.49.11
तत्राद्भुतमपश्याम धृष्टद्युम्नस्य पौरुषम्यदेकः समरे वीरस्तस्थौ गिरिरिवाचलः
tatrādbhutamapaśyāma dhṛṣṭadyumnasya pauruṣamyadekaḥ samare vīrastasthau giririvācalaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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