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महाभारत 6.5.19
य एतां वेद गायत्रीं पुण्यां सर्वगुणान्विताम्तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ स लोकान्न प्रणश्यति
ya etāṃ veda gāyatrīṃ puṇyāṃ sarvaguṇānvitāmtattvena bharataśreṣṭha sa lokānna praṇaśyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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