महाभारत 6.5.8
दिव्यबुद्धिप्रदीपेन युक्तस्त्वं ज्ञानचक्षुषाप्रसादात्तस्य विप्रर्षेर्व्यासस्यामिततेजसः
divyabuddhipradīpena yuktastvaṃ jñānacakṣuṣāprasādāttasya viprarṣervyāsasyāmitatejasaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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