महाभारत 6.51.40
एष चास्तं गिरिश्रेष्ठं भानुमान्प्रतिपद्यतेवपूंषि सर्वलोकस्य संहरन्निव सर्वथा
eṣa cāstaṃ giriśreṣṭhaṃ bhānumānpratipadyatevapūṃṣi sarvalokasya saṃharanniva sarvathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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