महाभारत 6.51.41
तत्रावहारं संप्राप्तं मन्येऽहं पुरुषर्षभश्रान्ता भीताश्च नो योधा न योत्स्यन्ति कथंचन
tatrāvahāraṃ saṃprāptaṃ manye'haṃ puruṣarṣabhaśrāntā bhītāśca no yodhā na yotsyanti kathaṃcana
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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