महाभारत 6.53.13
पत्तिसंघा रणे पत्तीन्भिण्डिपालपरश्वधैःन्यपातयन्त संहृष्टाः परस्परकृतागसः
pattisaṃghā raṇe pattīnbhiṇḍipālaparaśvadhaiḥnyapātayanta saṃhṛṣṭāḥ parasparakṛtāgasaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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