महाभारत 6.55.22तमेकं समरे शूरं पाण्डवाः सृञ्जयास्तथाअनेकशतसाहस्रं समपश्यन्त लाघवात्tamekaṃ samare śūraṃ pāṇḍavāḥ sṛñjayāstathāanekaśatasāhasraṃ samapaśyanta lāghavātइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें