महाभारत 6.62.2
विदितं तात योगान्मे सर्वमेतत्तवेप्सितम्तथा तद्भवितेत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत
viditaṃ tāta yogānme sarvametattavepsitamtathā tadbhavitetyuktvā tatraivāntaradhīyata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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